आशु भटनागर। 2 मई को उत्तर प्रदेश की पहली महिला पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह का जन्मदिन है। उनकी पहचान सिर्फ एक वरिष्ठ अधिकारी की नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘लेडी सिंघम’ की है, जिन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, संवेदनशीलता और असाधारण नेतृत्व से प्रदेश की कानून-व्यवस्था में एक नई मिसाल कायम की है। लक्ष्मी सिंह का नेतृत्व एक ऐसा प्रेरणास्रोत है, जो चुनौतियों के सामने झुकने के बजाय, उनसे डटकर मुकाबला करने की सीख देता है।
एक असाधारण पृष्ठभूमि
लखनऊ में 2 मई 1974 को जन्मी लक्ष्मी सिंह ने अपनी शुरुआती शिक्षा शहर के प्रतिष्ठित लोरेटो कॉन्वेंट से पूरी की। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संस्थान से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी. टेक की डिग्री हासिल की और स्वर्ण पदक विजेता भी रहीं। यह उनकी अकादमिक उत्कृष्टता का शुरुआती संकेत था, जिसने उन्हें आगे चलकर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में एक विशिष्ट स्थान दिलाया।
मिथकों को तोड़ने वाली पहली महिला कमिश्नर
वर्ष 2000 बैच की आईपीएस अधिकारी लक्ष्मी सिंह ने 2022 में जब नोएडा पुलिस कमिश्नरेट की कमान संभाली, तब कई लोगों ने यह सवाल उठाया था कि एक महिला अधिकारी इतने हाई-प्रोफाइल और चुनौतीपूर्ण जिले की जिम्मेदारी कैसे संभालेगी। लेकिन अपने पहले ही कार्यकाल में उन्होंने ऐसे कई मिथकों को तोड़ा और साबित किया कि नेतृत्व लिंग से नहीं, बल्कि क्षमता, साहस और दृढ़ संकल्प से तय होता है। उनकी कार्यशैली ने जल्द ही सभी शंकाओं का समाधान कर दिया।
नोएडा में लक्ष्मी सिंह हैं, बचकर रहना
नोएडा में बढ़ती लूट की घटनाओं को रोकने के लिए, लक्ष्मी सिंह खुद एक रात 2 बजे वर्दी में सड़कों पर उतर पड़ीं। उनके इस सघन चेकिंग अभियान का असर यह हुआ कि अगले तीन महीनों तक शहर में कोई बड़ी लूट की वारदात सामने नहीं आई। अपराधियों के मन में एक नया खौफ पैदा हुआ, यह जानते हुए कि कमिश्नर खुद सड़कों पर मौजूद हैं।
वहीं, साइबर अपराधों पर लगाम कसने के लिए उन्होंने ‘स्पेशल-35’ टीम का गठन किया, जिसके परिणामस्वरूप 6 महीनों में लगभग 1200 करोड़ रुपये की ठगी को रोका गया और 400 से अधिक साइबर अपराधी गिरफ्तार किए गए। दिल्ली-एनसीआर के ठगों के बीच साफ संदेश था— “नोएडा में लक्ष्मी सिंह हैं, बचकर रहना।” यह उनकी निर्णायक कार्रवाई का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
महिला सुरक्षा को मिली नई दिशा
महिला सुरक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाते हुए, लक्ष्मी सिंह ने ‘ऑपरेशन पिंक’ के तहत हर थाने में 24×7 महिला हेल्प डेस्क स्थापित करवाईं। वह खुद रात 11 बजे तक थानों का औचक निरीक्षण करती थीं, जिससे पुलिसकर्मियों में भी जवाबदेही की भावना बढ़ी। सेक्टर-18 में छेड़छाड़ की एक घटना में पुलिस ने मात्र 7 मिनट में पहुंचकर आरोपी को गिरफ्तार किया। इस त्वरित कार्रवाई ने शहर की महिलाओं को यह महसूस कराया कि “अब लगता है वर्दी में कोई अपना है।” यह पुलिस और जनता के बीच भरोसे का एक नया सेतु था।
संकटकाल में भी फ्रंटलाइन पर नेतृत्त्व
लक्ष्मी सिंह ने हर चुनौती में फ्रंटलाइन लीडर की भूमिका निभाई। चाहे कोविड-19 महामारी के दौरान पीपीई किट पहनकर कंटेनमेंट ज़ोन में पहुंचना हो, या किसान आंदोलन के दौरान 72 घंटे तक लगातार ड्यूटी करना, उन्होंने हमेशा व्यक्तिगत रूप से मोर्चा संभाला।
हाल ही में अप्रैल 2026 में हुए हिंसक श्रमिक आंदोलनों के दौरान उनकी भूमिका विशेष रूप से निर्णायक रही। उन्होंने न केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाए, बल्कि श्रमिकों की मांगों के समाधान के लिए एक मध्यस्थ के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने हिंसा को एक ‘सुनियोजित साजिश’ बताया और व्हाट्सएप समूहों व फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट्स के जरिए उकसाने वाले तत्वों की पहचान की। इस मामले में 350 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया और 10 एफआईआर दर्ज की गईं। ढिलाई बरतने वाले पुलिस अधिकारियों पर भी विभागीय कार्रवाई की गई। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि उनके नेतृत्व में प्रशासन और सरकार के साथ बातचीत के बाद श्रमिकों की 5 में से 4 प्रमुख मांगों को मान लिया गया, जिसमें वेतन वृद्धि और कार्यस्थल पर उत्पीड़न से जुड़ी कमेटियों का गठन शामिल था। उनकी इस प्रभावी रणनीति ने 1 मई (श्रमिक दिवस) को शांतिपूर्वक संपन्न कराने में अहम भूमिका निभाई।
‘लेडी सिंघम’ की छवि और जनता का भरोसा
आज नोएडा का हर नागरिक उनके नेतृत्व की सराहना करता है। उन्होंने यह साबित किया है कि वर्दी में सख्ती के साथ संवेदनशीलता भी हो सकती है। उनकी कार्यशैली ने लाखों युवतियों को प्रेरित किया है कि वे भी पुलिस सेवा में आकर समाज की रक्षा कर सकती हैं और एक सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।
लक्ष्मी सिंह का नेतृत्व सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साहस, संवेदनशीलता और निर्णायक कार्रवाई की एक ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
