शहर के बीचोबीच, ‘जीवन ज्योति’ नाम का एक बड़ा अस्पताल था। इस अस्पताल के मालिक और जाने-माने डॉक्टर थे विक्रम। डॉ विक्रम की महत्वाकांक्षा असीम थी। वह चिकित्सा सेवा के माध्यम से खूब पैसा कमाना चाहता था, ताकि राजनीति में प्रवेश कर सके। उनका मानना था कि धन ही सफलता की कुंजी है और राजनीति समाज में ऊंचा स्थान पाने का एकमात्र जरिया भी।
डॉ विक्रम ने अपने अस्पताल में हर छोटी-बड़ी चीज के दाम बढ़ा रखे थे। मरीजों से मोटी फीस वसूलना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। काउंटर पर बैठी युवती, रिया, मरीजों से फीस लेने का काम करती थी।
एक दिन, एक बूढ़ी औरत लाठी टेकती हुई अस्पताल में आई। वह बेहद कमजोर और थकी हुई लग रही थी। रिया ने उसे टोकते हुए कहा, “दादी, डॉक्टर की फीस 500 रुपये है।”
बूढ़ी औरत ने रिया की ओर बेबसी से देखा। उसकी आँखों में निराशा झलक रही थी। फिर गुस्से में बोली, “किस बात के पांच सौ रुपये दूँ? अभी तो तेरे डॉक्टर ने मुझे देखा भी नहीं है और न ही कोई दवाई दी है।”
रिया शांत भाव से बोली, “दादी, ये तो डॉक्टर साहब की फीस के पांच सौ रुपये हैं। जांच और दवाई के पैसे तो बाद में देने पड़ेंगे!”
इतना सुनते ही बुढ़िया का चेहरा उतर गया। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से बंधी हुई पुरानी गाँठ को खोला। उसमें कुछ नोट बंधे थे। उसने उन नोटों को गिना। कुल 150 रुपये थे। उन रुपयों को मुट्ठी में दबाते हुए वह रिया से बोली, “मुझे नहीं दिखाना तेरे डॉक्टर को। लूट मचा रखी है। गरीब आदमी कहाँ जाए?” यह कहते हुए वह धीरे-धीरे अस्पताल से बाहर जाने लगी।
उधर, ओपीडी में बैठा डॉ विक्रम, जो अपने अस्पताल का मालिक भी था, सब कुछ स्क्रीन पर देख रहा था। उसने अस्पताल में सीसीटीवी कैमरे लगवा रखे थे, ताकि वह हर गतिविधि पर नजर रख सके। वैसे तो विक्रम ने आज तक किसी मरीज को मुफ्त में नहीं देखा था, मगर पता नहीं आज क्यों उसके मन में दया का भाव जाग गया था। उसने तुरंत रिया को इंटरकॉम पर कहा, “रिया, उस बूढ़ी औरत को मेरे कक्ष में बुलाओ।”
रिया तुरंत बाहर गई और बुढ़िया को आवाज दी। बुढ़िया हिचकिचाते हुए वापस आई और डॉक्टर के कक्ष में प्रवेश किया।
डॉ विक्रम ने उसे कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। बुढ़िया डरी सहमी सी बैठ गई। विक्रम ने पूछा, “क्या बात है, दादी? क्या तकलीफ है आपको?”
बुढ़िया बोली, “मेरे पास तो बस डेढ़ सौ रुपया ही है बेटा।”
डॉ विक्रम बोला, “कोई बात नहीं दादी। आप डेढ़ सौ दे देना।”
बुढ़िया बोली, “डेढ़ सौ भी पूरा नहीं दूँगी। तीस रुपया बस किराया भी तो लगेगा। घर कैसे जाऊँगी?”
डॉ विक्रम मुस्कराया। आज उसे मरीजों से मोलभाव करते देख अजीब लग रहा था। फिर बोला, “ठीक है, आप कुछ न देना। अब बताओ तकलीफ क्या है?”
दादी ने अपनी तकलीफ बताई। उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी और चक्कर आ रहे थे। विक्रम ने दादी की दो-तीन जाँच करवाई। बीपी चेक किया। जाँच के बाद पता चला कि दादी को सिर्फ बीपी की समस्या है। विक्रम ने अपने अस्पताल के मेडिकल स्टोर से उसे एक महीने की दवाई मुफ्त में दे दी और आइंदा भी मुफ्त में दवाई देने का वादा किया।
बातों-बातों में दादी ने बताया कि वह अपनी विधवा बेटी के साथ रहती है और इस दुनिया में उसका कोई नहीं है। उसकी बेटी दूसरों के घरों में काम करके मुश्किल से गुजारा करती है।
इस तरह दो-तीन हजार का दादी का बिल माफ हो गया। दादी की आँखों में आँसू थे। वह विक्रम को आशीष देती हुई चली गई, “भगवान तुम्हें दुनिया की सारी खुशी दे।”
दादी के जाने के बाद डॉ विक्रम के अशांत मन को शांति मिली। पिछले एक महीने से उसका अपनी पत्नी छवि से झगड़ा चल रहा था। डॉ विक्रम अपनी महत्वाकांक्षाओं में इतना खो गया था कि उसने छवि को बिल्कुल भी समय नहीं दिया था। छवि को लगने लगा था कि विक्रम के जीवन में उसकी कोई जगह नहीं है। वह घर छोड़कर मायके जा चुकी थी और तलाक की धमकी दे रही थी। विक्रम को लग रहा था कि उसका परिवार बिखर रहा है, लेकिन वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था।
उस दिन विक्रम का मन शांत रहा। उसे ऐसे लगा जैसे बुढ़िया जाते-जाते उसके मन को ठीक करने की दवाई दे गई हो। जब वह रात को घर पहुँचा तो देखा छवि घर में मौजूद थी। उसे सब कुछ सपना सा लगा। छवि ने झगड़ा खत्म करने की बात की और कहा कि वह विक्रम को और एक मौका देना चाहती है। अचानक सब कुछ सही हो गया। विक्रम को समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हो गया।
उस दिन के बाद विक्रम बदल गया। उसने अपनी फीस 500 रुपये की जगह 50 रुपये कर दी और गरीबों का इलाज मुफ्त में करने का संकल्प ले लिया। उसने अस्पताल के कर्मचारियों को भी मरीजों के साथ विनम्रता से पेश आने के लिए कहा।
विक्रम समझ गया कि सबसे बड़ी खुशी तो मन की खुशी है, धन की नहीं। उसने महसूस किया कि दूसरों की मदद करने से जो आनंद मिलता है, वह किसी भी भौतिक सुख से बढ़कर है। उसकी महत्वाकांक्षाएं अब बदल चुकी थीं। अब वह पैसे के लिए नहीं, बल्कि लोगों की सेवा के लिए काम करना चाहता था।
धीरे-धीरे ‘जीवन ज्योति’ अस्पताल गरीबों के लिए एक उम्मीद की किरण बन गया। विक्रम मरीजों का इलाज मुफ्त में करता था और उन्हें दवाइयां भी मुफ्त में देता था। उसने कई गरीब बच्चों को शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति भी दी।
विक्रम की पत्नी छवि भी उसके इस बदलाव से बहुत खुश थी। उसने विक्रम को हर कदम पर साथ दिया और अस्पताल के कामकाज में उसकी मदद की। दोनों ने मिलकर एक खुशहाल और संतुष्ट जीवन जीना शुरू कर दिया।
विक्रम ने राजनीति में जाने का विचार त्याग दिया। उसे समझ में आ गया था कि सच्ची सेवा और लोगों की मदद करने से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। उसने अपना जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया और एक खुशहाल और संतुष्ट जीवन जीने लगा।
विक्रम की कहानी एक प्रेरणादायक कहानी है जो हमें सिखाती है कि सच्ची खुशी धन में नहीं, बल्कि दूसरों की मदद करने में है। यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने जीवन में हमेशा दयालु और उदार होना चाहिए।
ये कहानी सोशल मीडिया से ली गयी है

